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किंडरगार्टन कॉन्वोकेशन सेरेमनी: शिक्षा या बाजार का नया चेहरा !

प्रो. आरके जैन

जयपुरApr 03, 2025 / 04:24 pm

Neeru Yadav

क्या आपने कभी गौर किया कि शिक्षा का असली मतलब किताबों के पन्ने पलटना या परीक्षा के अंकों की भागदौड़ नहीं है? यह तो एक ऐसी नदी है, जो अनुभवों के संगम से बहती है और संस्कारों व सीख की धारा से लबरेज होती है। इस नदी का सबसे नन्हा, कोमल और चमकता किनारा है बचपन-वह अनमोल वक्त, जहां हर कदम एक नन्हीं विजय बन जाता है और हर सबक एक अनमोल मील का पत्थर। मगर सवाल यह उठता है कि क्या इस मासूम उम्र में “कॉन्वोकेशन सेरेमनी” जैसे औपचारिक आयोजन सचमुच जरूरी हैं, या यह बस एक चकाचौंध भरी परंपरा है, जो हमारी शिक्षा को बाजार के तामझाम में रंगकर रख देती है?
किंडरगार्टन (केजी) स्तर पर कॉन्वोकेशन सेरेमनी (दीक्षांत समारोह) का चलन हाल के वर्षों में तेजी से पंख पसार चुका है। इसकी शुरुआत पश्चिमी देशों से हुई, जहां अमरीका और यूरोप में ‘ग्रेजुएशन’ की परंपरा न सिर्फ हाई स्कूल और कॉलेज तक, बल्कि छोटे बच्चों के लिए भी ‘मिनी-ग्रेजुएशन’ के रूप में मनाई जाती रही है। वैश्वीकरण की लहर और सोशल मीडिया की चकाचौंध ने इसे भारत के दरवाजे तक ला खड़ा किया। आज कई निजी स्कूल इसे एक भव्य तमाशे की शक्ल दे रहे हैं-माता-पिता के दिल में यह अहसास जगाने के लिए कि उनका नन्हा सितारा ‘कुछ असाधारण’ हासिल कर चुका है, और स्कूल की ‘ब्रांड वैल्यू’ को आसमान छूने का मौका देने के लिए। मगर यह सवाल मन को कुरेदता है-क्या यह सचमुच बच्चों की तरक्की का जश्न है, या शिक्षा के आड़ में बाजार का एक नया खेल रचा जा रहा है?
अगर हम अपनी भारतीय परंपराओं की गहराई में झांकें, तो शिक्षा का असली रंग कभी औपचारिक टोपी और गाउन की चमक में नहीं सिमटा था। प्राचीन काल में “विद्यारंभ संस्कार” जैसे पवित्र आयोजन होते थे—एक प्रेरक और आत्मिक शुरुआत, जो बच्चे को ज्ञान के अनंत सागर में डुबकी लगाने के लिए तैयार करती थी। उस युग में बच्चों का बढ़ना और सीखना एक सहज लय की तरह था, जिसे न तो मंच की तालियों की जरूरत थी, न ही कागजी प्रमाणों की। मगर आज के किंडरगार्टन कॉन्वोकेशन सेरेमनी उस सरलता से मीलों दूर जा चुके हैं—ये पश्चिमी प्रभावों और स्कूलों की चतुर बाजार नीतियों का एक चटकीला मेल बनकर उभरे हैं।
तो क्यों न हम अपने नन्हे सितारों के लिए कुछ इतना जादुई और प्रेरक रचें कि हर दिल में उत्साह की लहर दौड़ जाए? उनकी प्रगति को मनाने के लिए ‘प्रदर्शन महोत्सव’ या ‘परिवार मिलन’ जैसे रंगारंग आयोजन हों, जहां बच्चे अपनी कला, खेल और रचनात्मकता के चमकते रंगों से आसमान को रोशन कर दें। भारतीय परंपराओं की गहरी छांव से निकला “ज्ञान महोत्सव” या “विद्यारंभ रंगोत्सव” जैसा समारोह हो, जो बच्चों को अपनी जड़ों की सुगंध से सराबोर करे और उनके भीतर सांस्कृतिक गर्व की लौ जगा दे। या फिर खेल, संगीत और ठहाकों से गूंजता एक ऐसा अनौपचारिक उत्सव, जो औपचारिकता की सख्त दीवारों को ढहाकर बच्चों की बेरोक हंसी और उनकी अनोखी प्रतिभा को सबके सामने चमकने दे।
ये आयोजन महज समारोह नहीं, बल्कि एक ऐसी मायावी दुनिया होंगे, जहां हर बच्चा खुद को अनमोल खजाने की तरह महसूस करे—बिना किसी बनावटी टोपी, गाउन या कागजी मुकुट के बोझ के। ये पल उनके नन्हे मन में आजादी और आत्मविश्वास का बीज बो सकते हैं, उन्हें सिखा सकते हैं कि असली जीत नंबरों की दौड़ या मंच की तालियों में नहीं, बल्कि उनकी जिज्ञासा की चमक, सपनों की उड़ान और दिल की अनछुई गहराइयों में छिपी है। ये रास्ते न सिर्फ आंखों को भाएंगे और दिल को लुभाएंगे, बल्कि शिक्षा के उस शाश्वत मंत्र को साकार करेंगे-जो बच्चों के भीतर सवालों की लहरें उठाए, उनकी कल्पना को अनंत आकाश दे और उन्हें अपनी असीम संभावनाओं का सूरज बनने की प्रेरणा दे।
किंडरगार्टन कॉन्वोकेशन सेरेमनी की यह चकाचौंध भले ही माता-पिता के चेहरों पर मुस्कान बिखेरे, मगर शिक्षा का असली खजाना न तो चमचमाते प्रमाण-पत्रों में बसता है, न ही मंच पर गूंजती तालियों की गड़गड़ाहट में। वह तो बच्चे के कोमल मन में पनपती नन्हीं सोच और उसके सपनों की अनंत चमक में छिपा है। हमें औपचारिकता की इस अंधी भागदौड़ से बाहर निकलकर ऐसे उत्सवों की ओर कदम बढ़ाना होगा, जो बच्चों को उनकी सहज राह पर उड़ान भरने का हौसला दें—जहां हर कदम उनकी जिज्ञासा को पंख दे और हर पल उनकी कल्पना को नया रंग। आखिर, शिक्षा का असली जश्न कोई अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक ऐसी अनंत यात्रा की पहली किरण होना चाहिए, जो बच्चों को उनकी अनोखी मंजिलों की ओर ले चले।

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