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अटकलें नहीं, जांच समिति की रिपोर्ट महत्वपूर्ण

संजय कुमार पाठक, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

जयपुरMar 26, 2025 / 04:20 pm

Neeru Yadav

प्रतीकात्मक फोटो

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के बंगले से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की खबर ने देशभर में आवेश, जिज्ञासा और मीडिया ट्रायल को जन्म दे दिया है। इस घटना के कुछ आधारभूत तथ्य तब सामने आए, जब सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर इससे संबंधित कुछ प्रासंगिक सामग्री प्रकाशित की गई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से न्यायिक कार्य वापस लेने सहित उचित निर्देशों के साथ तीन न्यायाधीशों की समिति का गठन करके इन-हाउस प्रक्रिया शुरू की है। चूंकि संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों से जुड़े कथित कदाचार के मामले कदाचित सामने आते हैं, इसलिए आम जनता इस तरह की शिकायतों से निपटने की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं होती।
जब न्यायाधीश स्वयं कानून का पालन नहीं करते तो उनका आचरण लोगों की आस्था को सबसे अधिक प्रभावित करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि जो लोग कानून के शासन को बनाए रखने का दायित्व निभाते हैं, वे स्वयं भी कानून के दायरे में रहें और उसका पालन करें। कोई भी व्यक्ति कानून या नियमों से ऊपर नहीं है। सभी न्यायाधीश भी कानून के शासन के अधीन हैं। संविधान के अनुच्छेद 217 में नियमित उच्च न्यायालय न्यायाधीशों, अनुच्छेद 224 के तहत नियुक्त अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों का उल्लेख है। किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया राष्ट्रपति द्वारा तभी शुरू की जा सकती है, जब संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाए। यह प्रक्रिया केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लागू हो सकती है।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में न्यायाधीशों के कदाचार या अक्षमता की जांच के लिए प्रावधान किए गए हैं। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की कोई संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, क्योंकि ये न्यायाधीश किसी अन्य न्यायाधीश के अधीनस्थ नहीं होते, मुख्य न्यायाधीश के भी नहीं। संविधान के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी मौजूदा न्यायाधीश के आचरण की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन, न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में मुख्य न्यायाधीश का यह कर्तव्य है कि वह न्यायिक मर्यादा बनाए रखें और न्यायिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास सुनिश्चित करें। इस संवैधानिक कमी को देखते हुए, ‘इन-हाउस प्रक्रिया’ को अपनाया गया, जिसके तहत उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों या न्यायाधीशों के विरुद्ध कोई शिकायत मिलने पर न्यायाधीशों के सहकर्मी ही जांच करते हैं और इसकी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौंपी जाती है।
न्यायाधीशों के विरुद्ध उचित कार्रवाई के लिए तीन स्तरों पर प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं। पहली उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए, दूसरी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के लिए और तीसरी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए। यदि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध कोई शिकायत मिलती है तो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सबसे पहले स्वतंत्र रूप से जांच कर यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोप सत्य हैं या नहीं। यदि आवश्यक हो तो वह गुप्त रूप से स्वतंत्र स्रोतों से जानकारी जुटा सकते हैं। यदि मुख्य न्यायाधीश को आरोपों में सच्चाई नजर आती है तो वह इस संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर सकते हैं और समस्त जानकारी उनके समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश प्राप्त जानकारी की सत्यता की पुष्टि करने के बाद उचित परामर्श या आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं। यदि वे यह तय करें कि आगे कोई कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है तो मामला वहीं समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि आगे की कार्रवाई की जरूरत महसूस होती है, तो इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार मुख्य न्यायाधीश आवश्यक कदम उठा सकते हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के मामले में इन-हाउस प्रक्रिया अपनाई गई थी। तीन न्यायाधीशों की समिति की जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन ने 4 अगस्त 2008 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखकर न्यायमूर्ति सेन को हटाने की अनुशंसा की थी। इस अनुशंसा के आधार पर संसद में न्यायमूर्ति सेन के विरुद्ध अनुच्छेद 124 के तहत महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई। लेकिन न्यायमूर्ति सेन ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान स्वयं ही इस्तीफा दे दिया था।
इसलिए यह स्पष्ट है कि इन-हाउस प्रक्रिया मात्र औपचारिकता नहीं है, अपितु महाभियोग की प्रक्रिया इसकी सिफारिशों के आधार पर ही शुरू की जाती है। हालिया मामले में मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तत्काल इन-हाउस प्रक्रिया के तहत एक तथ्य-जांच समिति गठित की है और अब तक उपलब्ध तथ्यों को सार्वजनिक किया है। इसलिए सभी को चाहिए कि समिति द्वारा अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक वे अपनी राय पेश करने में संयम बरतें।

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