सरकारी योजनाएं कागजों में ही आश्वस्त कर रही है, हकीकत में ये लोग प्यासे हैं। पत्रिका ने ईद के दिन इन परिवारों से पहली मुराद की बात की तो बोले- पीने को पानी गांव तक आ जाए,इससे बड़ी मुराद कोई नहीं।
यह है स्थिति
कुम्हारों का पार: 50 घरों के इस गांव में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण सालार खान बताते हैं कि वर्षों से परंपरागत स्रोत बेरियों पर ही निर्भर है। सुबह चार बजे उठकर परिवार के सदस्य बेरियों पर पहुंच जाते हैं। दो सदस्य घर के पानी लाने का कार्य करते हैं। मजदूरी पर वो जा नहीं सकते। ऊंट या गधे पर यह पानी आता है। जिनके पास ऊंट- गधे नहीं हैं, वे सिर पर ढोकर लाते हैं। बस हमारी एक ही मुराद है गांव-ढाणी तक पानी आ जाए। मठाराणी समेजा: आजादी के 77 वर्षों बाद भी इस गांव में पीने का पानी बेरियों से सींचना पड़ता हैं। 150 से अधिक घर है। यहां सकीना, इमामत और अन्य औरतें कहती हैं कि बचपन से विवाह तक हम और हमारी कई पीढिय़ों इन बेरियो का पानी भरते आए हैं। सरकारी हौदी में नियमित पानी नहीं आता हैं। हर घर नल जरूर लगे हैं , लेकिन नियमित आपूर्ति नहीं हो रही है।
मापूरी: सर्वाधिक मुस्लिम और कुछ मेघवाल घरों वाले इस ग्राम पंचायत मुख्यालय पर पानी गडरारोड से मंगवाना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि गडरारोड से ट्रैक्टर टंकी के 700 रुपए लगते हैं। यह सात सौ रुपए की पानी की टंकी बड़े परिवार में सात-दस दिन चलती है। दो हजार रुपए महीने के पानी के चाहिए। मजबूरी में पानी खींचने जाते है। हर घर नल आए और पानी भी,यही बड़ी मुराद है।
अभे का पार: रामसर उपखण्ड की इस ग्राम पंचायत मुख्यालय पर पानी नहीं आ रहा है। बीच में अवैध कनेक्शन की भरमार हो जाने से गांव की हौदी में पानी नहीं पहुंच रहा है।
प्रोजेक्ट में पहला टारगेट इन गांवों को बनाएं
हर घर नल योजना के तहत देश में उन इलाकों में तो नल लग रहे हैं, जहां पर पानी की पहले से सहूलियत है। ऐसे इलाके जहां पानी आज भी बड़ी समस्या है, वहां तक सबसे बाद में आ रहे हैं। प्रोजेक्ट में पहला टारगेट इन गांवों को बनाएं। नहरी पानी भी नहीं पहुंचा है। नर्मदा और इंदिरा गांधी कैनाल का पानी यहां पहुंचे तो समस्या का हल हो जाएगा।
– सलमानखान, प्रधान गडरारोड़