अगर यही गति बनी रही, तो सभी 9,200 स्कूलों के निर्माण में पांच दशक से अधिक समय लग सकता है। यह देरी शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को दर्शाती है और यह भी इंगित करती है कि बुनियादी ढांचे के विकास में नीति-निर्माताओं को अधिक ध्यान देने की जरूरत है। सरकार ने इस योजना के तहत छात्रों को स्मार्ट क्लास रूम, उन्नत प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और सुरक्षित परिवहन जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने का वादा किया था। इसके लिए करोड़ों रुपए के बजट का प्रावधान किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। कई स्कूलों में अभी भी निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है और जहां इमारतें तैयार हो भी गई हैं, वहां शिक्षण कार्य पूरी तरह शुरू नहीं हो सका है। इस देरी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की उपलब्धता और प्रबंधन की रही है। इतनी बड़ी संख्या में स्कूल बनाने के लिए पर्याप्त बजट, कुशल श्रमशक्ति और समन्वित प्रशासनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
यदि इन कारकों पर सही ढंग से ध्यान नहीं दिया जाता, तो किसी भी परियोजना में देरी होना स्वाभाविक है। इसके अलावा, सरकारी तंत्र में निर्णय लेने की जटिल प्रक्रिया, टेंडर स्वीकृतियों में देरी और परियोजना की प्रभावी निगरानी का अभाव भी इसकी धीमी गति के प्रमुख कारण हो सकते हैं। योजना को सफल बनाने के लिए क्रियान्वयन की गति बढ़ानी होगी। इसके लिए सुनियोजित कार्ययोजना तैयार करनी होगी, जिससे स्कूलों के निर्माण में तेजी लाई जा सके। प्रमुख कारण इन स्कूलों के लिए जरूरी बजट की अनुपलब्धता है। इसे दूर करना अत्यंत जरूरी है। इसके लिए निजी के साथ हाथ भी मिलाया जा सकता है। योजना में निजी भागीदारी को बढ़ावा देकर सरकार निर्माण की गति तेज कर सकती है।