साइबर गुलामी में फंसे पीडि़त ने पत्रिका से सांझा किया अपना दर्द
साइबर गुलामी में फंसे झुंझुनूं शहर के वार्ड नंबर 32 निवासी अशरफ ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि अगस्त 2024 में सोशल मीडिया के माध्यम से वे एक कंपनी के संपर्क में आए और ऑनलाइन आवेदन किया। जल्द ही उन्हें थाईलैंड जाने के लिए टिकट भेज दी गई। वहां पहुंचने पर, कंपनी ने जॉइनिंग दी और उनसे अंग्रेज़ी भाषा की जानकारी पूछी। जब उन्होंने असमर्थता जताई, तो उन्हें प्रशिक्षण दिया गया और फिर विभिन्न देशों के नागरिकों को ऑनलाइन ठगने के काम में लगा दिया गया। लगभग छह महीने तक अशरफ और उनके साथी इस मजबूरी में फंसे रहे। जब उन्होंने काम करने से इनकार किया, तो उन्हें एक छोटे कमरे में बंद कर दिया गया। डेढ़ महीने तक वे एक कमरे में फंसे रहे और किसी तरह भारतीय दूतावास से संपर्क किया। शिकायत के बाद, भारतीय दूतावास ने मामले को गंभीरता से लिया और इन युवाओं को छुड़ाने की प्रक्रिया शुरू की। आखिरकार, भारत सरकार की कोशिशों से सभी पीड़ितों को फ्लाइट के ज़रिए दिल्ली लाया गया, जहाँ से वे अपने-अपने घर पहुंचे।
कोई छुट्टी नहीं, परिजनों से बात करने की भी मनाही
अशरफ ने बताया कि उन्हें घंटों ऑनलाइन चैटिंग कर लोगों को ठगने के लिए मजबूर किया जाता था। काम से इनकार करने पर प्रताड़ित किया जाता, लेकिन कोई छुट्टी नहीं दी जाती थी। यहां तक कि मोबाइल का इस्तेमाल भी सीमित कर दिया गया था। परिजनों से केवल दुआ-सलाम की अनुमति थी, लेकिन विस्तृत चर्चा की मनाही थी। भोजन के नाम पर सिर्फ सीमित चीनी व्यंजन दिए जाते थे और मानसिक उत्पीड़न किया जाता था।