राजनीतिक जानकारों की मानें तो साल 2022 में एमसीडी चुनावों में मिली जीत के बाद आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच चल रही रस्साकशी के चलते स्थायी समिति निष्क्रिय रही। इससे दिल्ली के विकास में कई महत्वपूर्ण कार्य अधर में लटक गए। पार्षदों का कहना है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद जब कार्यकर्ता हतोत्साहित थे। तब पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने उनसे बातचीत का क्रम सीमित कर दिया। या फिर यूं कहें कि उन्होंने पार्षदों की ओर उचित ध्यान ही नहीं दिया। यह पार्टी में असंतोष बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण है।
पंजाब और गुजरात की ओर बढ़ा ध्यान
आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने वाले पार्षदों ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए बयान में बताया कि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद जब कई कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर जा रहे थे। तब अरविंद केजरीवाल या फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को आगे आकर कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए था। जो नहीं किया गया। इसके अलावा नगर निगम में भी पार्षद अपने दम पर निगम स्तर की लड़ाई लड़ रहे थे। इसमें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का कोई योगदान न होना पार्टी टूटने का तीसरा बड़ा कारण बना। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिली करारी हार के बाद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत पार्टी के वरिष्ठ नेता पंजाब पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। जबकि दिल्ली में मुख्य रूप से सौरभ भारद्वाज और आतिशी ने पार्टी की बागडोर संभाल रखी है। इसके अलावा सभी नेता ज्यादातर पंजाब में डेरा जमाए रहते हैं। इससे दिल्ली में नेतृत्व लगभग शून्य हो गया। इसके चलते दिल्ली एमसीडी में कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग अकेला पड़ गया और उनका मनोबल टूटने लगा। यह पार्टी में विद्रोह का चौथा कारण बन गया।
आंतरिक समन्यव की कमी से कार्यकर्ताओं का मोहभंग
शनिवार को एमसीडी में AAP पार्षदों के इस्तीफे और नई पार्टी के गठन की घोषणा के बीच एकसुर में पार्षदों ने आंतरिक समन्यव की पोल खोली। पार्षदों ने अपने इस्तीफे में इसका जिक्र करते हुए लिखा है “हम 2022 में AAP के टिकट पर चुने गए थे, लेकिन तब से शीर्ष नेतृत्व हमारे साथ कोई समन्वय बनाए रखने में असफल रहा। इसके चलते जनता से किए गए वादे अधूरे रह गए। हमें लगा कि हमारा इस्तेमाल सिर्फ दिखावे के लिए किया जा रहा है।” इससे यह बात साफ हो जाती है कि आम आदमी पार्टी में शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की भारी कमी थी। यह पार्टी टूटने का पांचवां बड़ा कारण बना।
AAP के प्रति जनता में कम हुआ विश्वास
दरअसल, आम आदमी पार्टी का उदय एक वैकल्पिक और आदर्शवादी राजनीति के वादे के साथ साल 2012 में हुआ था। शुरुआती सालों में दिल्ली की जनता को यह विश्वास भी हुआ कि यह पार्टी पारंपरिक राजनीति से अलग है। इसके साथ ही अपने वादों को गंभीरता से पूरा करने की इच्छुक है, लेकिन कुछ ही समय बाद ही पार्टी उन्हीं अंतर्विरोधों में उलझती नजर आने लगी। जिनके खिलाफ वह साल 2012 में खड़ी हुई थी। यह अंतर्विरोध उस समय और उजागर हुए। जब पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव हार गई। हालांकि इससे पहले नगर निगम चुनावों में उसे उल्लेखनीय सफलता मिली थी, लेकिन उसके कई प्रमुख नेता कानूनी मामलों में उलझ गए। जिसका असर उसकी राजनीतिक पकड़ पर साफ दिखा। दिल्ली में AAP को 13 साल तक मिला जनमत
दिल्ली में साल 2011 में सशक्त लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद साल 2012 में उभरकर सामने आई AAP को दिल्ली की जनता ने सिर माथे पर बिठाया। इसके चलते पहली बार साल 2013 के विधानसभा चुनाव में AAP को दिल्ली की 70 सीटों में से 28 पर जीत मिली। इसके बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चली। अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद साल 2015 और साल 2020 के विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी की सरकार बनती रही। हालांकि साल 2025 में AAP को करारी हार का सामना करना पड़ा।
दिल्ली की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत
दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी के 15 पार्षदों के इस्तीफे और नई राजनीतिक पार्टी के गठन की घोषणा ने राष्ट्रीय राजधानी के राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। दिल्ली में बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच जहां AAP के शीर्ष नेतृत्व पर कानूनी कार्रवाई और हालिया विधानसभा चुनावों में मिली हार जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। वहीं अब आम आदमी पार्टी के लिए हालिया दिनों में उपजे हालातों के बीच नेताओं को एकजुट रखना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। पिछले दिनों एमसीडी में आम आदमी पार्टी के 15 पार्षदों ने इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना ली। यह घटनाक्रम निश्चित रूप से ‘आप’ की सियासत पर गहरा असर डाल सकता है।