वैवाहिक रिश्तों में बढ़ती क्रूरता की घटनाओं की भयावहता केवल समाचार की सुर्खियां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे सामाजिक और वैयक्तिक मूल्यों के विघटन की ओर इशारा करती हैं। ज़रूरत है, इन घटनाओं को केवल आंकड़ों की तरह देखने की नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे मनोविज्ञान, मूल्यहीनता और बेहतर की तलाश में टूटते रिश्तों की पड़ताल करने की। बेहतर की तलाश की बढ़ती संस्कृति वास्तव में एक भ्रम बन गई है, जिसमें व्यक्ति यह मान बैठता है कि कोई भी रिश्ता त्याग करने योग्य है, जो उसकी महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में आए। रिश्तों में विश्वास और बंधन की पवित्रता अवसरवाद के तले दम तोड़ रही है। क्यों भूल रहे हैं कि बेहतर की तलाश में जिन हाथों ने किसी का जीवन छीना हो, वे हाथ विश्वास से किसी और का हाथ कैसे थाम सकते हैं। हत्याएं केवल शरीर की नहीं होतीं हैं बल्कि इससे विश्वास, समर्पण, प्रेम सब मर जाता है। जिस रिश्ते में जीवन को संजोने का वादा किया जाता है; यदि वही जीवन मिटा दिया जाए, तो वहाँ से कोई नया रिश्ता कैसे उपज सकता है, क्योंकि रिश्तों की पुनर्रचना कभी खूनी ज़मीन पर नहीं की जा सकती है।
हमारी संस्कृति हमें सिखाती आई है कि धैर्य, त्याग, क्षमा और समर्पण संबंधों की आत्मा हैं। लगता है अब यह शिक्षा छूटती जा रही है; हम तकनीक और तरक्की की ऊँचाइयाँ तो छू रहे हैं लेकिन भीतर से मूल्यहीनता के दलदल में डूबते जा रहे हैं। हम त्वरित संतोष के युग में जी रहे हैं—जहां रिश्तों को भी इंस्टेंट फूड की तरह देखा जा रहा है। ज़रा-सी दिक्कत आई नहीं कि विच्छेद, डायवोर्स या फिर चरम हिंसा।हो ये रहा है कि हम दिन-रात सोशल मीडिया में डूबे रहते है, जहाँ दूसरों की ‘हैप्पी मैरिज’ की बनावटी तस्वीरें देखकर अपने रिश्ते को कमतर या हीन मानने लगते हैं। यही असंतोष कई बार ईर्ष्या और आक्रोश में बदल जाता है। आधुनिकता और डिजिटल की दुनिया ने ‘स्व’ को इतना महत्त्व देना सिखा दिया है कि साझेदारी का भाव कम होता जा रहा है। मेरे अधिकार, मेरी खुशी, मेरे फैसले जैसे भाव हम की भावना को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। साथ ही आधुनिक वैवाहिक संबंधों में अब प्रेम की जगह पूर्णता की तलाश ने ले ली है—वो मुझे पूरा करे, मेरे जैसा हो परंतु यह भूल जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी का पूरक नहीं हो सकता है। जब यह अतार्किक कल्पना टूटती है, तो संबंध एक अधूरी आकांक्षा बनकर रह जाता है और यही अधूरापन धीरे-धीरे क्रोध और प्रतिशोध में बदल जाता है। वहीं जब समाज में एक-दूसरे को साधन मानकर रिश्ते बनाए जाने का चलन बढ़ रहा है, तो उनका टूटना केवल आकस्मिक नहीं होता है बल्कि एक नियत परिणति बन जाती है। पति या पत्नी को परफेक्ट पार्टनर की तलाश में ‘रखने योग्य’ और ‘हटाने योग्य’ की कसौटी पर कसना, रिश्तों को उपभोग की वस्तु बना देता है और जब उपभोग की संभावना समाप्त होती है, तब संबंधों में क्रूरता के कृत्य सामने आते हैं। ध्यातव्य है कि उपभोग की तृप्ति न तो संभव है और न ही उसकी सीमा है।
हमें ‘रिश्तों की रीति’ को समझने और उनमें संवाद और सह-अस्तित्व का आधार गढ़ने की आवश्यकता है। हमें बेहतर रिश्तों की तलाश में नहीं उलझना है, बल्कि मौजूदा रिश्ते को ही बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। कुछ रिश्तों में परफेक्शन की जगह नहीं होती है। हमें इस पवित्र बंधन को इस स्तर पर स्वीकारना चाहिए कि किसी भी स्थिति में कोई दूसरा विकल्प ज़ेहन में न आए। संतुष्टि, त्याग, समर्पण और प्रेम इस रिश्ते की सहयात्रा को सीमित संसाधनों में भी आनंदमय बना देते हैं।