रमेश कुमार ऐसे साइबर फ्रॉड को लेकर परेशान होने वाले अकेले व्यापारी नहीं हैं। देशभर में ऐसे सैकड़ों बिजनेसमैन रोजाना बिना कोई साइबर फ्रॉड किए परेशान हो रहे हैं। बैंक भी आंख मूंदकर बिना किसी जांच के खाता सीज करके अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। रमेश कुमार जैसे बिजनेसमैन अब डिजिटल लेन-देन से कतराने लगे हैं। यह कहीं न कहीं सरकार के प्रयासों को पीछे ले जाने जैसा है। दरअसल, साइबर सिक्योरिटी के नाम पर सबसे अधिक यदि कोई प्रभावित हो रहा है तो वह व्यापारी वर्ग है। जैसा रमेश कुमार का हमने उदाहरण दिया। साइबर फ्रॉड कोई और व्यक्ति करता है, लेकिन गाज व्यापारी पर गिरती है। उसने तो केवल अपना माल बेचा होता है।
माल भले 300 रुपए का बेचा होता है, लेकिन साइबर पुलिस बैंक के साथ मिलकर व्यापारी का खाता तत्काल ही सीज करा देती है, भले व्यापारी के खाते में 30 लाख रुपए ही क्यों न जमा हों? जबकि जिन आपराधिक धाराओं में साइबर फ्रॉड दर्ज होता है, उसमें अधिकांश में अधिकतम पेनल्टी एक लाख रुपए ही है। होना यह चाहिए कि जितनी राशि साइबर फ्रॉड करने वाले ने व्यापारी के बैंक खाते में ट्रांसफर की है, उतनी राशि को सीज कर बाकी खाते को खुला रहने देना चाहिए। इससे व्यापारी का रोजमर्रा का लेन-देन चलता रहेगा और उसका व्यापार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन ऐसा कतई हो नहीं रहा है। कमाल की बात यह है कि बैंक सीज खाते में पैसा तो जमा कर रहता है, लेकिन निकालने पर रोक लगा देता है। व्यापारी जब अनजाने में ऐसे किसी साइबर फ्रॉड की जद में जाकर पीडि़त होता है तो वह सबसे पहले साइबर पुलिस के पास पहुंचता है और फिर बैंक पहुंचता है। जब कहीं से राहत नहीं मिलती तो वह कोर्ट कचहरी पहुंचता है। कोर्ट की पहली-दूसरी तारीख पर ही उसे राहत मिल जाती है, लेकिन इस पूरी कवायद में व्यापारी को काफी आर्थिक नुकसान होता है। समय की बर्बादी होती है।
देखा जाए तो संविधान के आर्टिकल 20, 19 (1) जी, 21 के तहत व्यापारी के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। सवाल उठता है कि ऐसे में कंज्यूमर प्रोटेक्शन कहां चला जाता है? क्या यह बैंक की जिम्मेदारी नहीं है कि वह जांच करने के बाद ही व्यापारी के खातों को सीज करे, न कि साइबर पुलिस के एक आदेश पर पूरा खाता ही सीज कर दे। कंज्यूमर प्रोटेक्शन के तहत बैंक को देखना चाहिए कि क्या वाकई संबंधित खाते में कोई अनुचित लेन-देन हो रहा है या साइबर फ्रॉड के नाम पर अनावश्यक रूप से व्यापारी को परेशान किया जा रहा है। बैंक को साइबर थाने से जो एफआइआर मिलती है उसमें स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि व्यापारी के खाते में कितना रुपया ऑनलाइन जमा हुआ है और बैंक उस बात का मैसेज अपने ग्राहक को भी देता है। इसके बावजूद भी बैंक पूरे खाते को सीज कर देता है, इस तरीके से बैंक के अधिकारियों एवं साइबर थानों के अधिकारियों की जरा सी लापरवाही से व्यापारी के अधिकारों का हनन हो रहा है और उसका भारी नुकसान हो रहा है।
साइबर फ्रॉड के मायाजाल और बैंक अकाउंट सीज होने के डर के कारण अब काफी जगह तो व्यापारी ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से ही बचने लगे हैं। इससे न केवल उसका व्यापार प्रभावित हो रहा है, बल्कि उसकी सेल भी गिर रही है, क्योंकि आज की तारीख में ऑनलाइन ट्रांजेक्शंस बहुत तेजी से बढ़े हैं। सवाल यह है कि व्यापारी क्या करें? बिना दोष के वह सजा भुगत रहा है। बढ़ते साइबर अपराधों को लेकर निश्चित ही सरकार को कानून को सख्त करने की जरूरत है। लोगों को राहत पहुंचाने की जरूरत है, लेकिन रिपोर्ट दर्ज करने नाम पर व्यापारी वर्ग को परेशान करना भी उचित नहीं है। टैक्स देने वाला व्यापारी वर्ग बिना किसी कारण अपराधियों जैसा व्यवहार झेलने को मजबूर हो रहा है। कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रहा है। थाने के चक्कर लगाता है। केंद्र सरकार को तत्काल इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा न हो कि साइबर पुलिस और बैंकों के रवैये से डिजिटल इंडिया की मुहिम को गहरा धक्का लग जाए।