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देर रात संसद में ‘डबल गेम’ खेल गई मोदी सरकार, कुछ नहीं कर पाए विपक्षी दल

दिल्ली की सर्द रात में संसद भवन की रोशनी देर तक जलती रही, लेकिन यह रोशनी न तो गर्माहट दे पाई और न ही विपक्ष को राहत। वक्फ (संशोधन) विधेयक पर 14 घंटे की मैराथन चर्चा और मतदान के बाद जब लगा कि सदन की कार्यवाही खत्म होने वाली है, मोदी सरकार ने एक ऐसा […]

भारतApr 04, 2025 / 03:51 pm

Anish Shekhar

दिल्ली की सर्द रात में संसद भवन की रोशनी देर तक जलती रही, लेकिन यह रोशनी न तो गर्माहट दे पाई और न ही विपक्ष को राहत। वक्फ (संशोधन) विधेयक पर 14 घंटे की मैराथन चर्चा और मतदान के बाद जब लगा कि सदन की कार्यवाही खत्म होने वाली है, मोदी सरकार ने एक ऐसा दांव चला कि विपक्ष के हाथ-पांव फूल गए। रात के 2 बजे, जब अधिकांश सांसद थकान से चूर थे, सरकार ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की घोषणा पर चर्चा शुरू कर दी। यह चर्चा महज 41 मिनट तक चली, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह का 9 मिनट का जवाब भी शामिल था।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा, “नियम 37 के तहत राज्यसभा में सदन का समय शाम 6 बजे तक होता है। 8 घंटे की चर्चा दोपहर 1 बजे से रात 9 बजे तक होनी चाहिए थी, लेकिन वोटिंग 2:20 बजे हुई और सदन सुबह 4 बजे तक चला। यह गैरकानूनी है।” तिवारी ने दावा किया कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा और इसे असंवैधानिक घोषित किया जाएगा। लेकिन उस रात विपक्ष का गुस्सा और सवाल सिर्फ हवा में गूंजते रहे।

प्रस्ताव आते ही कांग्रेस को लगा झटका

लोकसभा में वक्फ विधेयक पारित होते ही संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन के वैधानिक प्रस्ताव को पेश करने का अनुरोध किया। यह प्रस्ताव 13 फरवरी को मणिपुर में केंद्रीय शासन लागू होने के बाद संसद के अनुमोदन के लिए लाया गया था। रिजिजू के इस कदम ने विपक्ष को हैरान कर दिया। विरोध के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने चर्चा शुरू करने का निर्देश दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रस्ताव पेश किया, और फिर जो हुआ, वह विपक्ष के लिए एक झटके से कम नहीं था।
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कांग्रेस सांसद शशि थरूर को चर्चा की शुरुआत के लिए बुलाया गया। थकान और हैरानी से भरे थरूर ने स्पीकर से पूछा, “क्या आप सचमुच इस वक्त चर्चा चाहते हैं? इसे कल सुबह कर लें।” लेकिन स्पीकर के अड़े रहने पर थरूर ने बोलना शुरू किया। उन्होंने मणिपुर की बिगड़ती स्थिति पर सवाल उठाए। थरूर ने कहा “मई 2023 से शुरू हुई अशांति 21 महीनों तक बढ़ती रही। कानून-व्यवस्था संभालने वाले नाकाम रहे। राष्ट्रपति शासन जरूरी है, लेकिन यह काफी नहीं,”। उनकी बातों में मणिपुर के लोगों का दर्द झलक रहा था, लेकिन देर रात की इस चर्चा में वह दमखम नहीं दिखा, जो दिन के उजाले में हो सकता था।

अमित शाह बोले- ये दंगा या आतंकवाद नहीं

अमित शाह ने 9 मिनट के जवाब में सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा, “मणिपुर की अशांति हाई कोर्ट के फैसले से शुरू हुई जातीय हिंसा का नतीजा है। यह दंगा या आतंकवाद नहीं। पिछले चार महीनों में कोई हिंसा नहीं हुई।” शाह ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “हिंसा को किसी पार्टी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यह दिखाने की कोशिश गलत है कि सांप्रदायिक हिंसा सिर्फ भाजपा के शासन में हुई।” शाह का जवाब संक्षिप्त लेकिन सधा हुआ था, जिसने विपक्ष को जवाब देने का मौका ही नहीं दिया।
रात की कार्यवाही सरकार की रणनीति का हिस्सा थी या मजबूरी, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इतना साफ है कि वक्फ विधेयक के बाद मणिपुर पर चर्चा का यह “डबल गेम” विपक्ष के लिए अप्रत्याशित था। थके हुए सांसद, सीमित समय और सरकार की तेजी ने विपक्ष को बैकफुट पर ला दिया। मणिपुर की जटिल स्थिति और वहां शांति की जरूरत पर बात तो हुई, लेकिन वह गहराई और असर छोड़ने में नाकाम रही। सरकार ने अपनी चाल चल दी, और विपक्ष सिर्फ शिकायत करता रह गया। यह रात संसद में सत्ता और रणनीति की जीत की कहानी बनकर रह गई।

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