CG News: इस तट पर 7 लाख से अधिक संख्या में पहुंचे कछुए, देखें प्रकृति का अद्भुत नजारा
CG News: ओडिशा के तट पर आए सात लाख से अधिक समुद्री मेहमान देखने को मिले हैं। बताया जा रहा है कि श्रीलंका से दो हजार किमी का सफर तयकर ओलिव रिडले प्रजाति के कछुए इस तट पर अंडे देने आए हैं।
CG News: अजय श्रीवास्तव/ओडिशा के गंजाम जिले में ऋषिकुलिया बीच इन दिनों लाखों की तादाद में ओलिव रिडले प्रजाति के कछुओं ने डेरा डाला हुआ है। दूर-दूर तक इन कछुओं को रेंगते हुए देखा जा सकता है। दुनिया के सबसे छोटे कछुए माने जाने वाले ओलिव रिडले श्रीलंका से करीब डेढ़ से दो हजार किमी का सफर कर यहां अंडे देने पहुंच रहे हैं। ये दुनिया के विलुप्त प्राय: जीवों की श्रेणी में आते हैं।
ओडिशा वन विभाग से मिले आंकड़ों की मानें तो अब तक छह लाख 98 हजार कछुए यहां आ चुके हैं। मास नेस्टिंग के दौरान यहां मछली पकडऩे पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहता है। 20 किमी के दायरे में कोई मछली नहीं पकड़ सकता। श्रीलंका से आए ओलिव रोहले प्रजाति के यह कछुए फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में इस बीच पर अंडे देने पहुंचते हैं। अंडे देकर यह वापस लौट जाते हैं। बताया जा रहा है कि 35 से 45 दिन बाद इन अंडे से बच्चे निकलेंगे ये बच्चे खुद से ही समुद्र में पहुंच जाते हैं।
45 से 60 दिन का इक्यूबेशन पीरियड
एक हजार ओलिव रिडले के बच्चों में से सिर्फ एक युवा अवस्था तक पहुंच पाता है। ये करीब 20 वर्ष में युवा होता है। इस वजह से इनका संरक्षण जरूरी है। जिस समुद्रतट पर इनकी हेचिंग (अंडे से बच्चे निकलने की प्रक्रिया) होती है, वह बच्चा जब युवा होता है तो वहीं अंडा देने के लिए आता है। इनकी मेटिंग समुद्र में ही होती है। 45 से 60 दिन इक्यूबेशन पीरियड होता है। अंडे देने और उन्हें छिपाने के लिए इन कछुओं को रेतीले बीच की जरूरत होती है, इसलिए गहिरमाथा और ऋषिकुलिया इनके लिए उपयुक्त है।
परजीवियों से बचाने लगातार हो रही सफाई
ओडिशा का वन विभाग व कुछ एनजीओ इन कछुओं व उनके अंडों को परजीवियों से बचाने में जुटे रहते हैं। दिन रात यहां सफाई की जाती है और अन्य जीव जंतुओं से अंडों को नुकसान पहुंचाने से रोकने की मशक्कत में सभी जुटे रहते हैं। आस पास की हाईमास्ट लाइटों को भी बंद कर दिया जाता है।
दिव्य शंकर बेहरा, एसीएफ, वन विभाग: ओलिव रिडले कछुओ की मास नेस्टिँग का पूरा साइंटिफिक डाटा वन विभाग रख रहा है। एक सप्ताह के भीतर करीब 6 लाख 98 हजार से ज्यादा कछुए आ चुके हैं। एक मादा कछुआ सौ से अधिक अंडे देती हैं। अंडों को रेत में दबाकर मादा समुद्र की ओर वापस चली जाती है।
पर्यटकों के लिए कौतुहल बना
गहिरमाथा भितर कनिका नेशनल पार्क का हिस्सा है इसलिए लोग बिना अनुमति के नहीं आ सकते। लेकिन जब ओडिव रिडले अपना आशियाना यहां बनाते हैं तब बड़ी संख्या में दुनियाभर के पर्यटक इसे देखने आते हैं। उस समय भी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह जगह ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 170 किमी दूर है।
क्यों जरूरी है ओलिव रिडले का संरक्षण?
CG News: समुद्री इकोसिस्टम के लिए ओलिव रिडले बहुत महत्वपूर्ण हैं। फूड चेन को बरकरार रखने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। अगर इनका अस्तित्व खत्म हो गया तो फूड चेन टूट जाएगा। कुछ प्रजातियों जैसे जेलीफिश आदि की जनसंख्या अत्यधिक बढ़ जाएगी जो समुद्री जीवों के लिए ठीक नहीं है। ओलिव रिडले समेत भारत में मौजूद सभी 5 प्रकार के समुद्री कछुओं को वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972 में कानूनी रूप से संरक्षित करने का प्रावधान है। सीआईटीईएस समझौते की परिशिष्ठ 1 में कछुओं के व्यापार पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया गया है।
ओलिव रिडले क्या हैं?
समुद्री कछुए की एक प्रजाति हैं। यह दुनिया का दूसरा सबसे छोटा समुद्री कछुआ है। ये कछुए प्रशांत, हिन्द और अटलांटिक महासागरों के गर्म जल में पाए जाने वाले मांसाहारी समुद्री कछुओं की एक प्रजाति हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट में इन्हें अतिसंवेदनशील प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है।
ये भी है खास- जानें ओलिव रिडले को
-डेढ़ से दो हजार किमी तक बंगाल की खाड़ी में से तैरते हुए गंजाम जिले के ऋषिकुलिया बीच पर पहुंचे हैं, अंडे देकर तत्काल लौट भी जा रहे हैं
एक हजार में सिर्फ एक ओलिव रेडिले हो पाता है युवा, इकोसिस्टम के लिए जरूरी है इनका अस्तित्व
सिर्फ ओडिशा के दो समुद्र तट पर अंडे देने आते हैं दुनिया के सबसे छोटे कछुए
20 साल में युवा होता है ओलिव रिडले
-अंडे सेने के समय समुद्र में मछली पकडऩे पर रहता है प्रतिबंध
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