याचिकाकर्ता को लगाई फटकार
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने लव कुश कुमार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि “यह ‘भोजपुरी अश्लीलता’ क्या है? अश्लीलता का कोई धर्म या क्षेत्र नहीं होता। यह बिना शर्त होनी चाहिए। कभी भी भोजपुरी को अश्लीलता न कहें। यह क्या है? अश्लीलता अश्लील है। अश्लीलता अश्लील है। कल आप कहेंगे कि दिल्ली अश्लील है। अश्लीलता अश्लीलता है। कोई क्षेत्र नहीं।” मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से कहा, “क्या आपने शारदा सिन्हा के बारे में सुना है? फिर यह भोजपुरी अश्लीलता क्या है?”
कोर्ट ने खारिज की याचिका
याचिकाकर्ता कुमार की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह विचार करने योग्य नहीं है, क्योंकि यह एक निजी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती है। पीठ ने टिप्पणी की, ‘हम रिट जारी नहीं कर सकते, क्योंकि रिट केवल राज्य या उसकी संस्थाओं के खिलाफ लागू होती है। आपका मामला सार्वजनिक कानून के क्षेत्र में नहीं, बल्कि निजी कानून के दायरे में आता है। इसलिए यह रिट याचिका मान्य नहीं हो सकती।’ इसके साथ ही, कोर्ट ने कुमार को सलाह दी कि वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का सहारा ले सकते हैं, जैसे आपराधिक मामला दर्ज करना। अदालत ने आगे कहा, ‘यदि आपको लगता है कि यह अपराध है और इस पर कार्रवाई होनी चाहिए, तो आप एफआईआर दर्ज कर सकते हैं। यदि पुलिस इसे दर्ज नहीं करती, तो आप कानूनी प्रक्रिया से वाकिफ हैं
दर्ज करवा सकते हैं FIR
कोर्ट के मुताबिक यह मामला सार्वजनिक कानून के तहत नहीं है। यह निजी कानून के तहत है। अगर आप अश्लीलता से आहत हैं, तो आपराधिक कानून प्रणाली के तहत उपाय है। एफआईआर या शिकायत दर्ज कराएं। अदालत ने कहा कि यह याचिका सार्वजनिक कानून के दायरे में नहीं आती है और वह इस पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है।