प्रशिक्षित शिक्षकों और विशेषज्ञों की कमी भी बड़ी बाधा
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने खेल और शारीरिक शिक्षा को महत्त्व दिया है, लेकिन इसे अब भी एक वैकल्पिक विषय के रूप में देखा जाता है।
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प्रशिक्षित शिक्षकों और विशेषज्ञों की कमी भी खेल शिक्षा के विकास में एक बड़ी बाधा बनी हुई है। चूंकि खेल विज्ञान और खेल प्रबंधन अपेक्षाकृत नए क्षेत्र हैं, इसलिए इन विषयों में योग्य शिक्षकों और विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित है। इससे विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और शिक्षण प्राप्त करने में कठिनाई होती है। वहीं, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने खेल और शारीरिक शिक्षा को महत्त्व दिया है, लेकिन इसे अब भी एक वैकल्पिक विषय के रूप में देखा जाता है। इसे मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित करने की सख्त आवश्यकता है ताकि विद्यार्थियों को खेल और शारीरिक शिक्षा में अधिक अवसर मिल सकें और इस क्षेत्र को एक सम्मानजनक करियर विकल्प के रूप में देखा जाए। जब तक खेल शिक्षा को मुख्यधारा में स्थान नहीं दिया जाएगा और इसे अन्य विषयों के समकक्ष नहीं माना जाएगा, तब तक खेल क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रगति करना मुश्किल होगा।
भारत में खेल शिक्षा को संगठित और प्रभावी बनाने के लिए एक केंद्रीय नियामक निकाय की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। इस दिशा में राष्ट्रीय खेल शिक्षा परिषद जैसे निकाय की स्थापना एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। यह निकाय देशभर के खेल और शारीरिक शिक्षा पाठ्यक्रमों को मानकीकृत करने के साथ-साथ खेल विज्ञान, खेल प्रबंधन, खेल पोषण और खेल मनोविज्ञान जैसे विषयों के लिए एक समग्र नीति विकसित कर सकता है।
इसके अलावा, शारीरिक शिक्षकों और खेल विशेषज्ञों के लिए प्रमाणन और लाइसेंसिंग की एक व्यवस्थित प्रक्रिया तैयार की जा सकती है, जिससे इस क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और प्रशिक्षण सुनिश्चित हो सके। अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) को बढ़ावा देकर खेल शिक्षा में नवाचार और आधुनिक तकनीकों का समावेश किया जा सकता है।
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